शिक्षा

दून विश्वविद्यालय में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर वाद-विवाद प्रतियोगिता

वक्ताओं ने पक्ष-विपक्ष में प्रस्तुत किए तर्क

देहरादून। दून विश्वविद्यालय ने अपनी साहित्यिक और वाद-विवाद समिति ‘वात्सल्य’ के माध्यम से आज ‘गौरा देवी स्मारक राष्ट्रीय वाद-विवाद प्रतियोगिता’ के चौथे संरकरण का आयोजन किया। इस प्रतियोगिता का आयोजन “नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) एक समावेशी और प्रगतिशील ‘विकसित भारत’ के निर्माण में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है” विषय के अंतर्गत किया गया।

पूरे भारत के संस्थानों से प्रतिनिधि, जिनमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (नई दिल्ली), ICAR-IVRI विश्वविद्यालय (बरेली, UP), रामजस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली), मोतीलाल नेहरू कॉलेज (नई दिल्ली), और उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालय और कॉलेज शामिल थे, ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया। प्रत्येक टीम में दो वक्ता थे, जिन्होंने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में अपने तर्क प्रस्तुत किए। ।

इस वर्ष की प्रतियोगिता का मुख्य विषय ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023)’ था-एक ऐसा संवैधानिक संशोधन जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है। यह कानून हाल के दशकों में भारत के प्रतिनिधि लोकतंत्र में किए गए सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक हस्तक्षेपों में से एक है; तथापि, इसका कार्यान्वयन अभी भी ‘परिसीमन प्रक्रिया’ से जुड़ा हुआ है, जिसके चलते इसका वादा केवल कागजों तक ही सीमित रह गया है और इसके लागू होने की समय-सीमा भी अनिश्चित बनी हुई है। इस कानून को वाद-विवाद का केंद्र बिंदु बनाकर, दून विश्वविद्यालय ने छात्रों के तर्कों को एक ज्वलंत राष्ट्रीय नीतिगत प्रश्न से जोड़ा-एक ऐसा प्रश्न जिसका लैंगिक समानता, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह प्रतियोगिता गहन अकादमिक विमर्श को समकालीन सार्वजनिक सरोकारों से जोड़ने के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

इस कार्यक्रम का शुभारंभ SOL की डीन डॉ. चेतना पोखरियाल द्वारा  दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। प्रस्ताव के पक्ष में बोलने वाले वक्ताओं ने यह तर्क दिया कि दशकों से महिलाओं को विधायिकाओं से सुनियोजित ढंग से बाहर रखा गया है, और स्वैच्छिक उपाय इस समस्या के समाधान में विफल रहे हैं; अतः संवैधानिक आरक्षण कोई ‘रियायत’ नहीं, बल्कि एक आवश्यक ‘सुधार’ है। इसके विपरीत, विपक्ष में बोलने वाले वक्ताओं ने यह तर्क दिया कि जिस कानून का कार्यान्वयन परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने तक स्थगित रखा गया हो, उससे तत्काल कोई विशेष राहत मिलने की संभावना नहीं है। उनका मानना था कि वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए केवल सीटों का आरक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन संरचनाओं में सुधार करना अधिक आवश्यक है जो मूल रूप से महिलाओं को राजनीति से बाहर रखने का काम करती है।

प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को क्रमशः 211,000, 27,500 और 25,000 की नकद पुरस्कार राशि से सम्मानित किया गया। अंग्रेजी श्रेणी के परिणाम इस प्रकार रहेः प्रथम स्थान -शिव्या (दून विश्वविद्यालय); द्वितीय स्थान संजना गुप्ता (DIT विश्वविद्यालय); तृतीय स्थान राजश्री (दून विश्वविद्यालय)। हिंदी श्रेणी के परिणामः प्रथम स्थान आरव शर्मा (दून विश्वविद्यालय); द्वितीय स्थान – संस्कृति दशमाना (दून विश्वविद्यालय); तृतीय स्थान हिमानी पाल (DAV PG कॉलेज)। ‘सर्वश्रेष्ठ टीम’ का पुरस्कार DAV PG कॉलेज में।

जजों के एक सम्मानित पैनल- जिसमें कमला पंत (सेवानिवृत्त उप निदेशक, स्कूली शिक्षा, उत्तराखंड), डॉ. देवेंद्र बुडाकोटी (फ्रीलांस कंसल्टेंट, पब्लिक मीडिया एजेंसी, मलेशिया, और Ghughuti.org के संस्थापक), अजय जुगरान (वकील और लेखक), और दीपांजलि राठौर (निदेशक, Learn Tastic, और मानद सचिव, वन्यजीव संरक्षण समिति) शामिल थेने प्रतिभागियों का मूल्यांकन किया। जजों ने अपने फीडबैक में प्रतिभागियों को याद दिलाया कि मंच पर कदम रखना ही अपने आप में साहस की मांग करता है, और यह कि हर प्रतियोगिता चाहे जीती जाए या हारी जाए- अपने साथ ऐसे सबक लेकर आती है जो सिर्फ नतीजों से कहीं ज़्यादा गहरे होते हैं।

कुलपति सुरेखा डंगवाल ने अपने संबोधन की शुरुआत दिवंगत गौरा देवी को श्रद्धांजलि देकर की, और संसद में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर प्रकाश डालते हुए, उन्हें नेतृत्व की भूमिकाओं के माध्यम से सशक्त बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। मुख्य अतिथि प्रो. देवेंद्र भसीन (उपाध्यक्ष, राज्य उच्च शिक्षा परिषद, उत्तराखंड) ने अपने संबोधन में यह बात कही कि जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो वे न केवल व्यक्तिगत रूप से आगे बढ़ती है, बल्कि राष्ट्र के व्यापक विकास में भी योगदान देती हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि महिलाओं में निवेश करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है, लेकिन इसके साथ-साथ ढांचागत बदलाव भी ज़रूरी हैं। इस कार्यक्रम की शोभा दुर्गेश डिमरी (रजिस्ट्रार), डॉ. राजीव, डॉ. राजेश भट्ट, डॉ. आबशार अब्बासी, छात्र संघ अध्यक्ष अंशुमान और प्रो. हर्ष घोभाल (अंबेडकर पीठ) ने भी बढ़ाई। धन्यवाद ज्ञापन आकांक्षा भट्ट (संयोजक, वात्सल्य) ने दिया; इस कार्यक्रम को सह-संयोजक सुश्री आस्था कोठारी और पूरी ‘वात्सल्य’ टीम के सहयोग से सफल बनाया गया।

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